Saturday 2 December 2017

वीडियो एडिटिंग के प्रकार तथा चरण Video Editing: Types & Steps (वीडियो संपादन)

वीडियो एडिटिंग के प्रकार तथा चरण

Video Editing: Types & Steps (वीडियो संपादन)


वीडियो एडिटिंग अथवा वीडियो संपादन वीडियो कार्यक्रम निर्माण का एक महत्वपूर्ण भाग है । किसी भी वीडियो कार्यक्रम का निर्माण कार्य मुख्यतः तीन चरणों से होकर गुजरता है- प्री-प्रोडक्शन
, प्रोडक्शन तथा पोस्ट-प्रोडक्शन । वीडियो संपादन पोस्ट-प्रोडक्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो वीडियो शूट किए जाने के बाद होता है । किसी भी फिल्म, टेलीविजन या डॉक्यूमेन्ट्री के लिए फिल्माई गई वीडियो सामग्री को आवश्यक कांट-छांट तथा अन्य विशेष प्रभावों के प्रयोग से उसे प्रसारण योग्य बनाने की कला को वीडियो संपादन या वीडियो एडिटिंग कहते हैं । वीडियो संपादन एक कलात्मक कार्य है जो वैज्ञानिक पद्धति की सहायता से किया जाता है । अर्थात् वीडियो संपादन कला और विज्ञान का रचनात्मक संगम है । आई मैक, एफसीपी मैक प्रो, एडोब प्रीमियर, एडियस इत्यादि वीडियो संपादन के लोकप्रिय सॉफ्टवेयर हैं जो वर्तमान में, एबी रोल सुविधा, डिजिटल ध्वनि संपादन और डिजिटल वीडियो संपादन सुविधाओं से युक्त हैं ।
वीडियो संपादन के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं-
§  लीनियर एडिटिंग ( Linear Editing) –
इसे रीयल टाइम एडिटिंग ( Real time Editing) तथा टेप-टू-टेप एडिटिंग (Tape-to-Tape Editing) भी कहा जाता है । 90 के दशक के पहले तक इसका प्रयोग अधिक किया जाता था । इसमें विभिन्न टेपों के कई वीडियो क्लिप एक ही टेप पर क्रमवार संपादित किए जाते थे । इस तरह की एडिटिंग में कवरेज के टेप्स को एक-एक करके कॉपी किया जाता है और फिर एक-एक करके ही उन्हें एडिट किया जाता है। इनमें ग्राफिक का अभाव था ।

§  नॉन-लीनियर एडिटिंग ( Non-Linear Editing) –
इसे डिजीटल एडिटिंग (Digital Editing), टाइम लाइन बेस्ड एडिटिंग (Timeline based Editing) तथा सॉफ्टवेयर बेस्ड एडिटिंग  (Softwere based Editing)भी कहा जाता है । इसमें विभिन्न कम्प्यूटर सॉफ्टवेयरों जैसे एफसीपी, एडोब प्रीमियर आदि की सहायता से संपादन का कार्य होता है । यह वर्तमान में सबसे प्रचलित विधि है जिसका प्रयोग विभिन्न मीडिया तथा फिल्म संस्थानों में हो रहा है । इसके अंतर्गत कट, पेस्ट जैसी बुनियादी सुविधाओं के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के ग्रफिक्स, ट्रांजीशन, एनिमेशन, साउन्ड इफेक्ट्स आदि संपादन के लिए उपलब्ध होते हैं ।

§  ऑफलाइन एडिटिंग ( Offline Editing) –
ऑफ़लाइन संपादन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कच्चे फुटेज को मूल फिल्म या वीडियो टेप को प्रभावित किए बिना मूल स्रोत से कॉपी कर संपादन कार्य किया जाता है ।
§  ऑनलाइन एडिटिंग (Online editing) –
इसका प्रयोग लाइव टेलीकास्ट करने के लिए होता है जिसमें 40 सेकेन्ड के बाद वीडियो प्रसारित होता है ।

वीडियो संपादन की प्रक्रिया (नॉन-लीनियर एडिटिंग के संदर्भ में )

डम्प इन                  रफ कट                   फाइनल कट                  डम्प आउट

§ डम्प इन (Dump in/ Import)- इसमें रिकॉर्ड किए गए फुटेज को कम्प्यूटर सिस्टम के वीडियो एडिटिंग सॉफ्टवेयर में हार्ड डिस्क या अन्य मेमोरी डिवाइसों से इन्सर्ट किया जाता है ।

§ रफ कट (Rough cut)- इस प्रक्रिया में रिकॉर्ड किए गए फुटेज को कम्प्यूटर सिस्टम के वीडियो एडिटिंग सॉफ्टवेयर के टाइमलाइन पर कथा-पटकथा के अनुसार क्रमवार रखने का कार्य किया जाता है । इसके पश्चात् ही आगे का संपादन कार्य संभव हो पाता है । इसे सिक्वेंसिंग (Sequencing) भी कहा जाता है ।

§ फाइनल कट (Final cut)- यह वीडियो एडिटिंग का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जिसमें समस्त संपादन का कार्य होता है जैसे- एनिमेशन, ग्राफिक्स, स्पेशल इफेक्ट्स, डबिंग, मिक्सिंग, ट्रांजीशन इफेक्ट्स, फेड इन तथा फेड आउट इत्यादि ।

§ डम्प आउट (Dump Out/ Export) – यह वीडियो एडिटिंग की प्रक्रिया का अंतिम भाग है । इसमें समस्त संपादन कार्य होने के बाद अंतिम रूप से संपादित वीडियो सामग्री को प्रसारण या भविष्य में अन्य प्रयोग के लिए अपनी मेमोरी डिवाइस में संरक्षित (Save) कर लिया जाता है ।

Sunday 19 November 2017

शोध का अर्थ, परिभाषा, तत्व, महत्व, प्रकार, चरण और शोध डिजाइन

शोध क्या है ? (What is Research?)

 

शोध के लिए अंग्रेजी में रिसर्च (Research) शब्द का प्रयोग किया जाता है। रिसर्च मूल रूप से लैटिन के ‘रि’ अर्थात् दुबारा और ‘सर्च’ अर्थात् खोजना से बना है । वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ज्ञान प्राप्त करने का निरंतर प्रयास ही शोध है ।

 अलग-अलग विद्वानों ने इसे कुछ इस तरह परिभाषित किया है-

§  रस्क के अनुसार शोध के एक दृष्टिकोण हैजांच-परख का तरीका और मानसिकता है

§  रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब  “दि रोमांस ऑफ रिसर्च” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा हैकि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं।

§  एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी ऑफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है।

§  स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिएतथ्यों के लिएनिश्चितताओं के लिए अन्चेषण है।

§  लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा हैकि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरणसाधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्धति है।

§  रूमेल  के अनुसार ज्ञान को खोजनाविकसित करना और सत्यापित करना शोध है

शोध को प्रेरित करने वाले चार प्रमुख तत्व हैं-

§  अज्ञात को जानने की जिज्ञासा

§  मौजूदा गहन समस्या के कारणों और प्रभावों को जानने की इच्छा

§  भावुकता से परे होकर असली कारणों की खोज करने की इच्छा

§  नया खोजने और पुरानी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं/विधियों को जांचने की इच्छा

 

शोध का महत्व-

§  शोध हमारे ज्ञान का विस्तार करता है ।

§  मानव समाज की समस्याओं के हल का रास्ता सुझाता है ।

§  शोध से तार्किक और समीक्षा की दृष्टि मिलती है ।

§  शोध के बिना ज्ञान और विकास में वृद्धि संभव नहीं ।

§  बदलती परिस्थितियों में तथ्यों की व्याख्या और पुनर्व्याख्या सिखाता है ।

 

शोध के प्रकार-

§   मौलिक शोध/विशुद्ध/शैक्षिक शोध- इसमें नए सिद्धांतों की स्थापनाओं पर बल दिया जाता है ।

§   व्यावहारिक शोध- किसी खास समस्या के समाधान के लिए इस शोध के निष्कर्षों का प्रयोग किया जाता है ।

§   क्रियात्मक शोध- इसके शोध निष्कर्षों का प्रयोग किसी समस्या विशेष के निवारण में प्रयोग किया जाता है ।

§   मात्रात्मक शोध- यह शोध आंकड़ों पर आधारित होता है और इसका निष्कर्ष भी आंकड़ों द्वारा ही निर्धारित होता है ।

§  गुणात्मक शोध- इस शोध में चरों का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषण किया जाता है । गुणात्मक से तात्पर्य है गैर संख्यात्मक डेटा संग्रहण या ग्राफ़ या डेटा स्रोत की विशेषताओं पर आधारित स्पष्टीकरण।

 

शोध प्रक्रिया के चरण- (Steps Of Research Process)

§  विषय/समस्या का चुनाव ( Selection of Research Problem)

§  साहित्य समीक्षा (Review of Literature)

§  उद्देश्य (Objectives)

§  परिकल्पना/शोध प्रश्न (Hypothesis and Research Question)

§  शोध विधि और डिजाइन (Research methodology and Design)

§  यूनिवर्स का चुनाव (Selection of Universe)

§  आंकड़ों का संग्रह (Data Collection)

§  आंकड़ों का वर्गीकरण (Classification of Data)

§  विश्लेषण और व्याख्या (Analysis and Interpretation)

§  शोध निष्कर्ष (Research Findings)

§  सारांश (Summary)

§  रिपोर्ट लेखनशोध सार (Report writing/ Executive Summary)

§  संदंर्भ सूची (Bibliography)


शोध डिजाइन- रिसर्च डिज़ाइन (Research Design)

शोध को न्यूनतम समयश्रम तथा ऊर्जा के साथ प्रभावी तरीके तैयार करने के लिए शोध से पूर्व जो रूपरेखा (ब्लूप्रिन्ट) तैयार करते हैं उसे ही शोध डिजाइन कहते हैं ।

शोध डिजाइन के मुख्य तीन सोपान होते हैं-

§  अवलोकन संबंधी (Observational)

§  सांख्यिकीय(Statistical)

§  क्रिया/प्रचालन संबंधी(Operational)

 

शोध डिजाइन के प्रकार-

प्रायोगिक (Experimental)- प्रयोगिक शोध को कारण और प्रभाव संबंध अध्ययन भा कहा जाता है । इसका लक्ष्य परिकल्पना (Hypothesis) को तथ्यों की कसौटी पर कसना है । इसमें प्रायोगिक तथा नियंत्रण (Control) समूह का प्रयोग किया जाता है ।

प्रयोगिक डिजाइन के निम्न प्रकार हैं-

 

3.      एक्स- पोस्ट फैक्टो

4.      पैनल स्टडी

5.      क्वासी- प्रायोगिक

 

अन्वेषणात्मक (Exploratory) शोध डिजाइन- पहले से मौजूद सिद्धांत का और गहराई से अध्ययन करने के लिए अन्वेषणात्मक (Exploratory) शोध डिजाइन का प्रयोग किया जाता है । इसमें शोधकर्ता विषय को समझता हैक्षेत्र खोजता हैअवधारणा विकसित करता हैशोध के उद्देश्य निर्धारित करता हैपरिकल्पना को अंतिम रूप देता है और शोध की सीमाओं पर विचार करता है ।

            इसके लिए निम्न विधियों का प्रयोग किया जाता है-

§  साहित्य समीक्षा

§  सर्वेक्षण

§  केस स्टडी

 

वर्णनात्मक (Descriptive) शोध डिजाइन- किसी स्थितिसमूह या व्यक्ति विशेष की विशेषताएं जानने के लिए वर्णनात्मक (Descriptive) शोध डिजाइन का प्रयोग किया जाता है । इसमें आंकड़ों का संग्रह निम्न प्रकार से होता है-

§  साक्षात्कारप्रश्नावली और अनुसूची

§  दस्तावेज

§  सर्वेक्षण

इन्हें भी पढ़ें-

सैंपलिंग ( निदर्शन ) Sampling

गुणात्मक तथा मात्रात्मक शोध


संदर्भ सूची-

मीडिया शोधमनोज दयाल

संचार और मीडिया शोधविनीता गुप्तावाणी प्रकाशन

Saturday 18 November 2017

हमारा सांसद कैसा हो ?

 

इस विषय पे लिखते हुए दिमाग में सबसे पहले फिल्म 'पान सिंह तोमरका वह दृश्य याद आता है जहाँ नायक कहता है कि "बीहड़ में तो बाग़ी होते हैंडकैत तो संसद में होते हैं।" सिनेमा को समाज का दर्पण शायद इसीलिए माना गया है क्योंकि यह फिल्म बड़ी साफगोई से हमारे  समाज को चलाने वाले 'तंत्रका काला चेहरा हमारे सामने लाती है । आंकड़े भी बताते हैं कि मौजूदा कई सांसदों और विधायकों पर अपराधिक मामले चल रहे हैं ।

अब विषय पर आते हैं । हमें खुद को विश्व के सबसे बड़े और गौरवशाली लोकतंत्र का हिस्सा मानते हुए बड़ा गर्व महसूस होता है ज़ाहिर है इसे गौरवशाली बनाने में कार्यपालिकान्यायपालिकाविधायिका और मीडिया के साथ-साथ हर उस व्यक्ति की भागीदारी है जो इस देश का नागरिक है । संविधान ने हमें लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया यानि कि चुनाव में मताधिकार का हक़ दिया है ताकि हम अपने क्षेत्र से सुयोग्य प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेजें , पर सवाल यहीं से शुरू होता है कि हमारा सांसद कैसा हो?

अभी तक हमारे देश का राजनीतिक समीकरण काफ़ी हद तक जातिधर्मलिंगक्षेत्र-विशेषआर्थिक स्थिति इत्यादि पर ही आधारित रहा है और मौजूदा चुनाव को लेकर भी तमाम कसमे-वादे इन्ही मुद्दों के आसपास दिखाई दे रहे हैं ।  खुद एक नया मतदाता होने के नाते मेरी नज़र में इसबार कुछ बदलाव जरुर होने चाहिए ।

हमारे सांसद चुनने की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर चाहिए शिक्षित होनाक्योंकि जब हमारा सांसद शिक्षित होगा तभी वो अपने और जनता के अधिकारों के बारे में अच्छी तरह जान पायेगावरना इस देश के राजनैतिक इतिहास में निरक्षरों के हाथ में भी सत्ता की बागडोर जा चुकी है जिसका परिणाम वहाँ

की जनता आजतक भुगत रही है ।
हमारा सांसद जाति-धर्म
क्षेत्र जैसे परंपरागत मुद्दों के बजाय एक आदमी के रोजमर्रा के जीवनशैली को प्रभावित करने वाले कारकों जैसे रोटी-कपड़ा-मकान के साथ-साथ स्वास्थ्यशिक्षारोजगार मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी लेने का भी वादा करे । हमारे सांसद अपने चुनावी घोषणापत्र में बड़े-बड़े लोकलुभावन वादों जैसे लैपटॉपटैबलेट की बजाय समाज के सभी वर्गों जैसे महिलाओं से लेकर बुज़ुर्गों तकबच्चों से लेकर युवाओं तकदलितों से लेकर अल्पसंख्यकों तकसभी के समावेशी विकास की वकालत करता हो ।

हमारा सांसद वही बने जो किसी भी प्रकार के अपराधिक मामलोंभ्रष्टाचार से दूर हो ताकि संसद में 'बाहुबलियों','दागियोंको प्रवेश ना मिले । हमारे सांसद को अपने क्षेत्र की सामाजिकआर्थिक तथा भौगोलिक परिवेश का वास्तविक ज्ञान हो अर्थात वह इनसब से जमीनी स्तर से जुड़ा हुआ हो । इसलिए इस बार सबसे पहले तो हमें राजनीति को हिक़ारत की नज़रों से देखना बंद करना होगा क्योंकि जबतक हम समाधान का हिस्सा नहीं बनेंगे तबतक हमें कोई हक़ नहीं बनता की हम उस समस्या पे ऊँगली उठाएं । आइए हमसब यह ठान लें

कि,,

ना झुकना है,ना सहना है

मन में ले यह सोच

लोकतंत्र के इस अस्त्र को थाम,

करेंगे वोट पे चोट ।

प्रोडक्शन के चरण #मीडिया प्रोडक्शन

प्रोडक्शन के चरण #मीडिया प्रोडक्शन

(Post Production#Media Production)

 

जब किसी कार्यक्रम की परिकल्पना बननी शुरू होती है, तो उससे लेकर उसे मूर्तरूप में प्रस्तुत करने तक  प्रोडक्शन की प्रक्रिया तीन चरणों से होकर गुजरती है । प्री-प्रडक्शन, प्रोडक्शन, पोस्ट-प्रोडक्शन । प्रोडक्शन के बारे में कहा जाता है कि वह 99योजना 1क्रियान्वयन होता है ।

प्रोडक्शन के तीन चरण होते हैं-

ž प्री-प्रोडक्शन

ž प्रोडक्शन

ž पोस्ट-प्रोडक्शन

1. प्री-प्रोडक्शन-

किसी भी कार्यक्रम का निर्माण करने से पहले,उस कार्यक्रम की पूरी रूपरेखा तैयार की जाती है ।

§ कार्यक्रम का स्वरूप

§ कार्यक्रम की अवधि

§ प्रयोग होने वाले उपकरण

§ टीम का निर्धारण

§ बजट का निर्धाण

§ स्क्रिप्ट

2. प्रोडक्शन

किसी भी कार्यक्रम की पूरी रूपरेखा तैयार होने के बाद रिकॉर्डिंग के दौरान की सारी प्रक्रिया प्रोडक्शन के दायरे में आती है ।

 शूटिंग इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसमें पटकथा के अनुरूप दृश्यों को विभिन्न कैमरों की सहायता से फिल्माने का कार्य होता है ।

3. पोस्ट-प्रोडक्शन-

जहाँ हम अपने कार्यक्रम को अन्तिम रूप प्रदान करते हैं उसे पोस्ट-प्रोडक्शन कहते हैं । अर्थात् जहाँ से प्रोडक्शन कार्य समाप्त होता है और प्रसारित करने योग्य बनाने तक का सारा कार्य पोस्ट-प्रोडक्शन के अन्तर्गत आता है ।

संपादन

किसी भी प्रोग्राम को रिकॉर्ड करते हैं तो उसमें विभिन्न तरह की त्रुटियाँ होती हैं । इन्हीं त्रुटियों को सुधारने के लिये संपादन कार्य किया जाता है । इसके अंतर्गत निम्निलिखित कार्य होते हैं

Ø     साउन्ड -

जब हम कोई भी कार्यक्रम बनाते हैंतो उस कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिएउसकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न प्रकार के साउन्ड अथवा म्यूज़िक भी डालते हैं ।

जैसे- चिड़ियों की आवाजझरने की आवाज

Ø     स्पेशल ऑडियो इफेक्ट-

जैसे- शीशा टूटने की आवाजआवाज का गूंजना,दरवाजा खोलते समय जो आवाज आती हैइत्यादि।

Ø     ट्रांजिशन (परिवर्तन करना)-

आवाज में फेरबदल करने के लिए तरह-तरह के ट्रांजिशन होते हैं ।

जैसे- Amplify, Auto Duck, Change Pitch, Change Speed, Change Tempo. इत्यादि।

Ø     ऑडियो फाइल फॉर्मेट-

सब कुछ करने के बाद हम अपनी आवश्यकता अनुसार प्रोग्राम को जिस फॉर्मेट चाहें उस फॉर्मेट में कन्वर्ट करके रख सकते हैं । जैसे-mp3, AAC, wma, wave, AIF, MPC. इत्यादि।

Ø     स्टोर करना-

सब कार्य करने के बाद प्रोग्राम को जिस स्टोरेज डिवाइस में चाहते हैंउसमें स्टोर करके प्रसारित करते हैं अथवा रख लेते हैं ।

निष्कर्ष-

किसी भी कथा/पटकथा को काल्पनिकता की दुनिया से निकालकर परदे पर साकार करने के लिए तथा रिकॉर्ड किए गए रॉ फुटेज को एक संपूर्ण कार्यक्रम में ढालकर उसे प्रसारित करने योग्य बनाने में प्रोडक्शन के तीनों चरणों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है । इन तीनों चरणों के निष्पादन के लिए के लिए विशेषज्ञों की एक पूरी टीम होती है जिनके माध्यम से पूरा कार्य संचालित होता है ।

 

संदर्भ-

टेलीविजन प्रोडक्शन, डॉ.देवव्रत सिंह

Friday 17 November 2017

गुणात्मक तथा मात्रात्मक शोध

गुणात्मक तथा मात्रात्मक शोध

(Qualitative & Quantitative Research)

 

शोध का अर्थ - मानव अदिकाल से ही जिज्ञासु प्रवृति का प्राणी रहा है । अपने शारीरिकमानसिकबौद्धिक विकास के साथ-साथ उसकी आवश्यकताएं भी बढ़ती गईं । इन्हीं आवश्यकताओं के निदान के प्रयास से शोध प्रक्रिया का जन्म हुआ ।

शोध क्या है ?

शोध व्यवस्थितवैज्ञानिक और तार्किक प्रक्रिया हैजिसका उद्देश्य नवीन सूचनाओं की खोजउनका सत्यापन (Verification) और उसके कारणों और प्रभावित करने वाले संबंधों की व्याख्या है ।

 रैडमैन और मोरी के अनुसार-

नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए किए गए व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध या अनुसंधान कहते हैं ।

शोध के प्रकार

Ø मौलिक शोध/विशुद्ध/शैक्षिक शोध- इसमें नए सिद्धांतों की स्थापनाओं पर बल दिया जाता है ।

Ø व्यावहारिक शोध- किसी खास समस्या के समाधान के लिए इस शोध के निष्कर्षों का प्रयोग किया जाता है ।

Ø क्रियात्मक शोध- इसके शोध निष्कर्षों का प्रयोग किसी समस्या विशेष के निवारण में प्रयोग किया जाता है ।

Ø मात्रात्मक शोध- यह शोध आंकड़ों पर आधारित होता है और इसका निष्कर्ष भी आंकड़ों द्वारा ही निर्धारित होता है । आंकड़ों के संकलन और विश्लेषण पर नए आंकड़ों को निकालन ही मात्रात्मक शोध का उद्देश्य होता है ।

निगमनात्मक पद्धति का प्रयोग:-  किसी वस्तु या प्रक्रिया में जो वस्तु या प्रमाण मिलते हैउनका निरीक्षण किया जाता है और इस तरह किसी एक समान्य सिद्धान्त के आधार पर अलग-अलग विशेष सिद्धांत बनाए जाते हैं ।

Ø गुणात्मक शोध- इस शोध में चरों का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषण किया जाता है ।  गुणात्मक से तात्पर्य है गैर संख्यात्मक डेटा संग्रहण या ग्राफ़ या डेटा स्रोत की विशेषताओं पर आधारित स्पष्टीकरण ।

आगमन पद्धति का प्रयोग:- किसी वस्तु या प्रक्रिया में जो वस्तु या प्रमाण मिलते हैउनका निरीक्षण किया जाता है और इस तरह अनेक सामान वस्तुओं और प्रक्रियाओं (प्रोसेस) में परिलक्षित विशेष तत्वों के आधार पर समान्य सिद्धान्त बनाये जाते हैं ।


मात्रात्मक एवं गुणात्मक शोध में अंतर

 


निष्कर्ष-
शोध के विभिन्न प्रकारों में गुणात्मक तथा मात्रात्मक शोध का विशेष स्थान है । गुणात्मक शोधमात्रात्मकता के स्थान पर व्यक्तिगत अनुभवों और विश्लेषण पर जोर देता है वहीं मात्रात्मक शोध में हम प्राप्त ज्ञान की जांच करते हैं। गुणात्मक शोध के निष्कर्ष में भावसंवेदना व पक्ष को स्थान दिया जाता है जबकि मात्रात्मक इनका अभाव होता है ।

इन्हें भी पढ़ें-

शोध का अर्थपरिभाषा,तत्वमहत्वप्रकार,चरण और शोध डिजाइन

 

सैंपलिंग ( निदर्शन ) Sampling


संदर्भ सूची

पुस्तकें-

•      मीडिया शोधमनोज दयालहरियाणा साहित्य अकादमी

•      संचार और मीडिया शोधविनीता गुप्तावाणी प्रकाशन

•      सामाजिक अनुसंधानराम आहूजा

इंटरनेट-

https://reeta-yashvantblog.blogspot.in/2016/03/blog-post.html

Thursday 16 November 2017

मीडिया कन्वर्जेन्स

मीडिया कन्वरजेंस (Media Convergence)

 

कन्वरजेंस क्या है ?

सूचना से संबन्धित सभी प्रौद्योगिकियों का सम्मिलन व इन सभी का एकीकृत प्रयोग कन्वरजेंस कहलाता है । आज के युग की मांग भी यही है । जिस प्रकार अब समय व जगह की  बचत के हिसाब से डाकघरोंबैंको एवं कार्यालयों में सभी सुविधाओं के लिए एक ही काउंटर होता हैवैसे ही अब सभी प्रकार की मीडिया तकनीकियों को भी एक ही माध्यम की सहायता से प्रयोग मे लाया जा रहा है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सूचना प्राप्त करने के सभी माध्यमों का एक ही माध्यम में समागम मीडिया कन्वरजेंस है ।

   उदाहरण के लिये हम कम्प्यूटरइंटरएक्टिव टीवीटैबलेट एवं मोबाइल जैसेआधुनिक यंत्रो को ले सकते हैं, जहां केवल एक ही यंत्र  के द्वारा हम संचार के सभी साधनों का उपयोग कर पाते हैं । 

मीडिया कन्वर्जेंस की अवधारणा-

मीडिया पर अपने व्यापक अध्ययन को केन्द्रित करते हुए जनसंचार के अनेक विशेषज्ञों ने कनवर्जिंग मीडिया के लिय कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिये हैं ।

जॉन पावलिक और शॉन मैकिन्टोश ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘कनवर्जिंग मीडिया : एण्ड इंट्रोडकशन टू मास कम्युनिकेशन’ में माध्यमों के आपसी होड़ व आपसी निर्भरता की चर्चा की है । आज भले ही  हम संचार के  सभी माध्यमों का उपयोग बड़ी आसानी से एक ही माध्यम से कर ले रहे हैं परन्तु अतीत में इस प्रकार के विचार को सत्य करने में बहुत से संचारविदों एवं वैज्ञानिकों को कठिन परिश्रम करना पड़ा है । समय के साथ-साथ मीडिया का कंवरजेंस इतनी तेजी से हुआ है कि उपरोक्त लेखकगण को अपनी किताब पूरी करने में जितना समय लगा उतने समय में मीडिया  कंवरजेंस के आयाम ही बदल गये एवं इसमें और अधिक तकनीकी विस्तार हो गया । यही कारण था कि इस किताब के प्रकाशित होने के तुरंत बाद ही उन्हें मीडिया कन्वरजेंस का फिर से वर्णन करना पड़ाजिसके लिये इन दोनों लोगों को एक नई किताब ‘कंवर्जिंग मीडिया: ए न्यू इंट्रोडक्शन टू मास कम्युनिकेशन’ लिखनी पड़ी। शुरूआत में मीडिया कन्वरजेंस का मतलब था ‘संचार के एक माध्यम के कार्यक्रमों का प्रसार किसी दूसरे माध्यम से करना’, परन्तु वर्तमान समय में  मीडिया कन्वरजेंस का मतलब है संचार के सभी माध्यमों का प्रसार सिर्फ एक ही माध्यम से करना | पुराने समय में समाचारपत्रों में केवल समाचार छपते थे और विज्ञापन के लिये पम्पलेट या पोस्टर छापे जाते थे। धीरे-धीरे समाचारपत्रों ने विज्ञापन छापने शुरु कर दियेइस प्रकार एक संचार माध्यम का दूसरे संचार माध्यम में अभिसरण(सम्मिलन) हुआ। इंटरनेट के आविष्कार से पहले ऐसे म्यूजिक प्लेयरो का प्रचलन हुआ जिनमे अपनी पसंद के ऑडियो टेप भी बजाये जा सकते थे एवं रेडियो के कार्यक्रम भी सुना जा सकता था

 विशेषज्ञों के विचार

जेनकिंस के अनुसार , “एक से अधिक मीडिया उद्योगों के बीच सहयोग और मीडिया दर्शकों के प्रवासी व्यवहार तथा एक से अधिक मीडिया सामग्रियों का एक प्लेटफार्म पर प्रवाह ही कन्वरजेंस है ।

अंतर्राष्ट्रीय टेलिक्म्युनिकेशन यूनियन (आई. टी. यू.) के अनुसार- “पूर्व में पृथक तथा विशिष्ट व्यापारिक बाज़ारों (जैसे – प्रसारणमुद्रणकेबल टेलिविजनफीक्स्ड वायर टेलीफोन इत्यादि) का एक साथ सम्मिलन ही मीडिया कन्वरजेंस है ।

    मीडिया कन्वरजेंस से लाभ

1999 में न्यूयार्क के एक विज्ञान मेले में ऐसा टेलीविज़न सेट प्रदर्शित किया गया जो टीवीरेडियोरिक़ॉर्डरफैक्सटेलीफोनप्रोजेक्टर का मिश्रण था। इस प्रकार ऐसे माध्यमों का विकास शुरू हुआ जहां व्यक्ति अपनी जरूरत की सभी सुविधाए आसानी से पा ले।                                      

 वास्तव में  कन्वरजेंस टेलीकम्युनिकेशनब्रॉडकास्टिंगनेटवर्किंग तथा इंटरएक्टिविटी को सम्मिलित कर एक ऐसे एकल डिजिटल माध्यम का निर्माण करता है जिससे उपभोक्ता की सभी आवश्यक्ताएँ (टेलीफोनफैक्सकैमेराकिताबेटीवीसंगीतगेम्सवीडियोइंटरनेटरेडियो इत्यादि) एक ही श्रोत से पूरी हो जाती हैं । इस प्रकार समयश्रमधन एवं जगह की भी बचत हो जाती है ।

 

निष्कर्ष

कन्वरजेंस पुराने एवं नये मीडिया का ऐसा चौराहा है जहां से व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार संचार माध्यमों का उपयोग कर सकता है । मीडिया कन्वरजेंस का उद्देश्य ही यही है कि व्यक्ति किसी एक ही माध्यम में उलझने के बजाय एकसाथ सभी सूचानाएं प्राप्त करे, साथ ही इसके द्वारा व्यक्ति संचार में प्रयोग हो रही नई-नई तकनीकों से भी अवगत होता है । मीडिया कन्वरजेंस से ही ऑनलाइन मीडिया आज अपने शिखर पर पहुंचा है । कन्वरजेंस की बदौलत ही आज कोई भी व्यक्ति पलक झपकते मनचाही सूचना पा सकता है । कन्वरजेंस के कारण ही ग्लोवल विलेज़ की परिकल्पना साकार हुई है । इस प्रकार हम कह सकते है कि आज सम्पूर्ण विश्व में जिस प्रकार संचार क्रांति एवं सूचना क्रांति में विस्फोट हुआ उसमें वह मीडिया कन्वरजेंस की महत्वपूर्ण भूमिका है ।

 

संदर्भ सूची

¢ हेना नक़वीपत्रकारिता एवं जनसंचारउपकार प्रकाशन

¢ ऑगस्ट इ. ग्रान्ट व जेफ्री एस. विलकिनसनअंडरस्टैंडिंग मीडिया कन्वर्जेंसऑक्सफोर्ड पब्लिकेशन

 

बाजारवाद और पत्रकारिता

 

बाजारवाद और भारतीय पत्रकारिता मूल्य

 

 

भारतीय पत्रकारिता का अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। इसके अतीत पर अगर नज़र डालें तो हम पाते हैं कि भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत ही अन्याय,दमन और शोषण के ख़िलाफ आवाज़ उठाने से होती है । यानि इस दौरान की पत्रकारिता के केन्द्र में लोकहितअनिवार्य रुप से शामिल था । देश की आज़ादी में भारतीय पत्रकारिता के अमूल्य योगदान को सदा याद किया जाता है और अनंत काल तक किया जाता रहेगा। तब से लेकर आज तक तमाम उतार-चढ़ावों से गुज़रने के बावजूद पत्रकारिता के विकास का पहिया सरपट दौड़ रहा है । समाचार पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो-टेलीविजन चैनल, इंटरनेट के बढ़ते प्रचार-प्रसार से इसे समझा जा सकता है । 4 जनवरी 2016 के दैनिक भास्कर अख़बार में प्रकाशित वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज़पेपर्स एंड न्यूज़ पब्लिशर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार दैनिक भास्कर 35.57 लाख़ प्रसार संख्या के साथ विश्व का चौथा व देश का सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला अख़बार बन गया है । जापान के शीर्ष दो अख़बारों योमीउरी शिनबुन तथा असाही शिनबुन व अमेरिका के यूएस टुडे के बाद चौथा स्थान दैनिक भास्कर को दिया गया है । सिर्फ प्रिंट ही नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में भी लगातार वृद्धि जारी है ।

ट्राई (टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया) के आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान में निजी सेक्टर में करीब 245 एफ.एम. चैनल तथा आकाशवाणी के 414 चैनल प्रसारण कर रहे हैं । प्रिंट से रेडियो, टीवी से सिनेमा और वर्तमान में इंटरनेट, सोशल मीडिया से चलकर स्मार्टफोन से जन्मे एप्प जर्नलिज्म’ तक भारतीय पत्रकारिता का दायरा बढ़ता ही जा रहा है ।  परन्तु वक़्त के साथ-साथ हुए तकनीकी विकास और पूंजी के बढ़ते निवेश के कारण  भारतीय पत्रकारिता के बुनियादी ढ़ांचे का विकास तो हुआ लेकिन उसके साथ आने वाले आर्थिक-राजनीतिक दबाव के कारण  नैतिक मूल्यों में गिरावट नज़र आने लगी । जो पत्रकारिता आज़ादी के पहले मिशन के रुप में स्थापित थी, आज़ादी के बाद प्रोफेशन और वर्तमान में एक उद्योग में तब्दील हो चुकी है ।

नब्बे के दशक में भारतीय पत्रकारिता में विदेशी पूंजी के आगमन के साथ ही पत्रकारिता के मूल्यों और दायित्वों की दशा और दिशा बदलने लगी । एक तरफ़ तो आज तकज़ी न्यूज़एन.डी.टी.वी. जैसे नए-नए निजी टीवी न्यूज़ चैनल खुले,अख़बारों का कलेवर बदलने लगा वहीं दूसरी तरफ़ भारतीय पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों की ज़मीन पर मुनाफे की घुसपैठ भी होने लगी। पत्रकारिता में बाज़ार के शामिल होने के कारण ही सर्कुलेशन, रैम (रेडियो ऑडियंस मेज़रमेन्ट), टी.आर.पी.(टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट),वेब हिट्स तथा डाउनलोड्स की अवधारणा का जन्म हुआ जिसने बाजार का एक पूरा तंत्र ही विकसित कर दिया जहां सभी मीडिया समूह सबसे तेज़-सबसे पहले समाचार परोसने, ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन पाने की होड़ में शामिल होने लगे। इस होड़ ने ख़बरों के चुनाव, उसकी भाषा,प्रस्तुति शैली सबको बदलकर रख दिया ।

 आदर्श पत्रकारिता के मुख्यतचार उद्देश्य माने गए हैं- सूचना देना, शिक्षित करना, मनोरंजन करना तथा जनमत का निर्माण करना । परन्तु पत्रकारिता पर बाज़ार के बढ़ते प्रभाव के कारण इन्फोटेन्मेंट नामक तत्व को प्रमुखता से शामिल कर लिया गया है । भारतीय पत्रकारिता पर बढ़ता पूंजी का असर और उससे बढ़ती कमाई के आंकड़ों की तरफ यदि नज़र डालें तो हम पाते हैं कि यह दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है । भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग पर 2015 में फिक्की-केपीएमजी ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है । इस रिपोर्ट के अनुसार 2013 के मुकाबले 2014 में मीडिया ने लगभग 11.07 प्रतिशत ज़्यादा व्यापार किया जो करीब 1026 करोड़ रुपये का है । इस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक इस उद्योग का विकास अगले कुछ वर्षों तक लगभग 14 फीसदी तक रहने के आसार हैं । इसी रिपोर्ट के अनुसार टेलीविजन उद्योग ने अकेले ही 474 करोड़ रुपये का व्यापार किया है । 263 करोड़ रुपये के साथ प्रिंट मीडिया दूसरे स्थान पर है । ऐसी बढ़ोतरी रेडियो, फिल्म, संगीत आदि माध्यमों के संदर्भ में भी दर्ज की गई है । साथ ही 2014 में विज्ञापनों के जरिये भी मीडिया ने 414 करोड़ रुपये कमाए जो 2014 की तुलना में 14.02 फीसदी अधिक है । फिक्की-केपीएमजी की इस रिपोर्ट में प्रकाशित इन आंकड़ों से भारतीय पत्रकारिता के एक फलते-फूलते उद्योग के रूप में स्थापित होने की पुष्टि हो जाती है ।

जब पत्रकारिता पर पूंजी का प्रभुत्व और मुनाफे का दबाव बढ़ेगा तो ज़ाहिर है कि मीडिया संस्थानों द्वारा प्रसारित-प्रकाशित ख़बरों,रिपोर्टों,परिचर्चाओं,इत्यादि की विषय-वस्तु भी प्रभावित होगी। बाज़ार द्वारा उत्पन्न इस प्रतिस्पर्धा में ख़बरों के प्रसारण के नाम पर ही ख़बरों को मारा जाने लगा है । किसान, आदिवासी,दलित और महिलाएं जैसे हाशिए पर जी रहे लोगों की समस्याओं, मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर उन ख़बरों की जगह घर वापसी, लव-जिहाद, मिशन पाकिस्तान, आरक्षण, अंडे-स्याही फेंकने, विदेश यात्रा, जहरीली बयानबाज़ी इत्यादि राजनीतिक हित से जुड़ी ख़बरों को सौंप दी गई है । अपराध, क्रिकेट, बॉलीवुड से जुड़ी ख़बरों को सनसनीख़ेज बनाकर पेश किया जाने लगा है । समाचारों का ट्रेन्ड तथा सोशल मीडिया पर उनका हैशटैग  चलने लगा है ।  ख़बरों की विविधता मरने लगी है । मीडिया महानगर केन्द्रित हो चला है । पाठक, श्रोता और दर्शकों को उपभोक्ता में तब्दील कर दिया गया है ।

आज इन तमाम ख़ामियों से मीडिया संस्थानों की साख़ पर सवालिया निशान उठने लगे हैं क्योंकि इससे समाचारों की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है । हालांकि इनसब के बावजूद भारतीय पत्रकारिता की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है । बाज़ार व राजनीति के दबाव को झेलते हुए इंटरनेट व सोशल मीडिया से लोगों में नई उम्मीदें भी जगी हैं । इसने ‘वैकल्पिक मीडिया’ तथा ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ की संकल्पना को जन्म दिया है जहां समाज की मुख्यधारा से कटे तथा भेदभाव से ग्रसित वर्ग की ताकतवर अभिव्यक्ति की गुंजाइश है । जहां हाशिये पर धकेल दिए गए लोग अपने अधिकार,प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार, शोषण जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रख रहे हैं । सत्ता से सवाल पूछ रहे हैं । उनकी आलोचना कर रहे हैं । इसलिए निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में भारतीय पत्रकारिता के समक्ष बाज़ार से हाथ मिलाते हुए व्यापक स्तर पर अपनी पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ दबे- कुचलों, शोषित लोगों की ज़ुबान बनते हुए लोकतंत्र के चौथे खंभे के रुप में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की दोहरी चुनौती है ।

 

 

विकाश कुमार

एम.फिल. (जनसंचार)

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा, महाराष्ट्र-442005

संदर्भ सूची-

फिक्की-केपीएमजी मीडिया रिपोर्ट-2015

http://www.trai.gov.in/