Tuesday, 4 December 2018

न्यूज़ चैनल टैगलाइन (Taglines of News Channels in India)

न्यूज़ चैनल टैगलाइन (

Taglines of News Channels in India) (FOR UGC-NET 2019)


Aaj Tak : Sabse Tez ( The Fastest )
Asianet News : Straight. Bold. Relentless.
BBC World : International News Television
Bloomberg UTV : BLUNT. AND SHARP.
Channel One : Mazboot Iraade Badhte Kadam
CNBC-TV18 : First in Business Worldwide
CNEB News : Khabar..Bante Bharat Ki
CNN : Go Beyond Borders
CNN IBN : Whatever it takes
DD News : Bharosa Bharat Ka
ET Now : Now the power of knowledge on your screens.
ETV News : ETV-Mee Tv
FOX News : The Most Powerful Name in News
Headlines Today : Sharp News for Sharp People
IBN-7 : Khabar har keemat par ( News at any cost )
IBN Lokmat : Chala jag jinkooya ( Come, let us conquer the world )
India News : Sach Jo Aap Jaanana Chahte Hain
India TV : Desh Badalna Hai To Channel Badlo
Kolkata TV : Raatdin Saatdin
Live India : Khabar Hamari, Faisla Aapka
Mahuaa Khobor : Jante Thakun
NDTV 24×7 : Fight for Change. You’ve Got a Friend.
NDTV India : Khabar Wahi Jo Sach Dikhaye
NDTV Profit : News You Can Use
NE TV (Northeast Television) : Feel the Pulse
News 24 : Nazar Har Khabar Par
News Live : Pushing Northeast 24X7
NewsX : Clarity in a Complex World
PuthiyaThalaimurai TV : unmai udanuk udan (truth as it happens)
Sahara Samay : No talking heads. Lots of feature programming
Star Ananda : Egiye Thake Egiye Rhake
ABP News (STAR News) : Aapko Rakhe Aage
Star Majha : Uhada Dole Bagha Neet ( Open your eyes and see clearly )
Suvarna News 24×7 : Nera Ditta Nirantara ( Straight Clear Always )
T News : Telangana Gunde Chappudu ( The Pulse of Telangana )
Times Now : Always with the news
TV5 (Telugu) : The Most Trusted Name in News
TV9 Gujarat : Garv Chhe Gujarati Chhun
TV9 : For a better society
Zee 24 Ghantalu (Tamil) : Nijam nippu lantidi ( Truth is like burning charcoal)
Zee 24 Ghante Chhattisgarh : Sawal Aap Ka Hai
Zee 24 Taas (Marathi) : Ek Paul Pudhe ( One step ahead )
Zee Business : Money Matters Simplified
Zee News : Haqeeqat jaisi Khabar waisi

सन्दर्भ :
http://infobharti.com/advertising-slogans-of-leading-companies/taglines-of-news-channels-in-india.php/amp (साभार)

Sunday, 18 February 2018

मीडिया स्वामित्व (Media Ownership)/ मीडिया प्रबंधन

मीडिया स्वामित्व (Media Ownership)/ मीडिया प्रबंधन

          किसी भी समाचार-पत्र के लिए वृहद स्तरीय पूँजी-निवेशआधुनिक तकनीकों व विभिन्न प्रकार की क्षमता व कौशल वाले मानव संसाधनों की आवश्यकता होती है। समस्त संसाधनों को नियंत्रित करने के साथ-साथ नियोजनडिजाइनिंग व उत्पादन आदि को सुचारु रूप से चलाने के लिए हर समाचार-पत्र के पीछे मीडिया प्रबंधन का अपना तंत्र होता है। किसी भी समाचार-पत्र का स्वस्थ्य व निष्पक्ष सम्पादकीय उक्त समाचार-पत्र के प्रबंधन-तंत्र की कार्य-कुशलता व नीतियों पर निर्भर करता है। सामान्यतः सम्पादकीय नीतियाँ और व्यापारिक गतिविधियां प्रबंधन-तंत्र के अनुसार भिन्न होती हैं। हमारे देश में समाचारों की प्रबंधन प्रणाली कई दौड़ से गुजरी है। समाचार-पत्र के मालिकों ने वैश्विक परिवर्तनों के साथ कदम से कदम मिलाते हुए अपनी प्रबंधन तकनीकों व मालिकाना हक़ की पद्धतियों में समय-समय पर परिवर्तन किया है। किसी भी समाचारपत्र की लोकप्रियता /प्रसारउसमें छपे विज्ञापन /राजस्व का सीधा संबंध समाचार-पत्र के स्वामित्व प्रणाली से है।
          समाचार पत्र हो या फिर अन्य कोई संगठनसभी में मुख्य रूप से पाँच प्रकार के स्वामित्व होते हैं-
1.     एकल स्वामित्व
2.     साझेदारी
3.     संयुक्त पूंजी कम्पनी
4.     न्यास या ट्रस्ट
5.     समितियां एवं संस्थाएं
          पूर्व में समाचार पत्र प्रायः एक व्यक्ति द्वारा ही संचालित किया जाता थाक्योंकि उसका स्वरूप इतना विस्तृत नहीं था। पत्रकारिता उस समय मिशन थीछोटे-छोटे पत्र स्थानीय जगहों से निकाले जाते थेउनकी प्रसार संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी। आज के युग में भी किसी भी छोटे पत्र का संचालन एकल स्वामित्व या एक व्यक्ति के द्वारा किया जाता है। किन्तु जीतने भी बड़े समाचार पत्र हैंउनके उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उनका संचालन किया जाता है। जब से पत्रकारिता ने प्रोफेशन का रूप धरण किया हैतब से इसके स्वामित्व की बात उठने लगी है।

एकल स्वामित्व :-
          एकल स्वामित्व से तात्पर्य हैपूरे संगठन पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार होना या एक ही व्यक्ति के हाथों में समाचार-पत्र के समस्त शेयरों की बागडोर। ऐसे स्वामित्व में प्रबन्धकमुद्रकसंपादक व मालिक एक ही व्यक्ति होता है। सभी निर्णय लेने के लिए वह स्वतंत्र होता हैवह अपनी इच्छानुसार कोई भी नीतियाँ बना सकता हैकिसी अन्य व्यक्ति के समक्ष उसे जवाबदेही नहीं होती है।समाचार-पत्र का स्वामी सार्वजनिक हित पर आधारित इस समाचार-पत्र का एक निजी उद्धम की तरह संचालन करता है। इस संचालन में उसकी सहता के लिए विशेषज्ञों का एक प्रबंध-तंत्र होता है। इस तंत्र के सदस्य अपने-अपने क्षेत्र के कार्यों के कुशल निष्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं और कार्य की प्रगति का ब्यौरा समाचार-पत्र के स्वामी को देते हैं। उदाहरणस्वरूप हमारे देश में हिंदुस्तान टाइम्स के मालिक के॰ के॰ बिड़ला व द टेलीग्राफ के मालिक अविक सरकार हैं।
एकल स्वामित्व के गुण -
1.     एकल स्वामित्व में मालिकमुद्रकप्रकाशक एक ही व्यक्ति होता है।
2.     विभिन्न प्रकार के निर्णयों की उसे स्वतन्त्रता होती है।
3.     उसके लाभ व विकास के लिए वह जी जान से मेहनत करता है।
4.     उसे किसी के समक्ष जवाबदेही नहीं देनी होती है।
5.     अन्य किसी व्यक्ति का उसके ऊपर दबाव नहीं होता है।  
एकल स्वामित्व के दोष -
1.     एक ही व्यक्ति जहां सभी कार्यों को देखता हैवहाँ कार्य ठीक प्रकार से नहीं हो सकता । क्योंकि वह चारों तरफ व्यवस्था नहीं बना सकता है।
2.     कई बार वित्त संबंधी कठिनाई आ जाती हैतो उसे अपने घर से पैसा लगाना पड़ता है।
3.     प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अपने आपको स्थापित करना मुश्किल होता है।
4.     एक ही व्यक्ति पर बहुत ज्यादा उत्तरदायित्व आ जाता है।
5.     मालिक की मृत्यु के बाद उसके संगठन को चलाने में कठिनाई आती है।


साझेदारी मीडिया स्वामित्व :-
          दो या दो से अधिक व्यक्तियों के एक साथ मिलकर साझा हित के उद्देश्य से की गई शुरुआत साझेदारी है। विधिक रूप से भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार साझेदारी उन व्यक्तियों का आपसी समझौता है जो कि सामूहिकता के स्वरूप से शुरू किए गए व्यवसाय के मुनाफे को आपस में बाँटना स्वीकृत करते हैं। ऐसी साझेदारी फर्म में व्यक्तियों की संख्या कम-से-कम दोऔर अधिकतम संख्या 20 तक हो सकती है। इस प्रकार की फर्म शुरू करने से पूर्व सहभागिता पत्र में निम्नलिखित तथ्य एवं सूचनाएँ सम्मिलित की जाती है।
1.     व्यवसाय का नाम
2.     कुल जमा पूँजी
3.     स्थान का नाम
4.     साझेदारी के कर्तव्य व अधिकार
5.     मुनाफे का समायोजन
          इसके साथ ही सम्पूर्ण प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद साझेदारी फार्म का पंजीयन फार्म रजिस्ट्रार से करवाया जाता है। द हिन्दू साझेदारी स्वामित्व पर आधारित स्वामित्व प्रणाली का एक उदाहरण है।
साझेदारी स्वामित्व के लाभ :-
1.     फर्म के प्रबंधन में विविध व्यक्तियों के कौशल का लाभ मिलता है।
2.     सम्मिलित राय मशविरे से निर्णय सहज रूप में लिए जा सकते हैं।
3.     एक व्यक्ति में कार्यों का बोझ नहीं रहता है। सभी में कार्यों का विभाजन कर दिया जाता है।
4.     अधिक पूँजी निवेश होने पर कार्य का स्तर बढ़ाया जा सकता है।
5.     दायित्वों का विभाजन अलग-अलग व्यक्तियों की क्षमता के अनुसार होने से कार्य परिणाम भी बेहतर एवं प्रभावी होते हैं।
साझेदारी स्वामित्व प्रणाली की हानियाँ :-
1.     कई बार किन्हीं नीतियों पर साझेदारों की आपस में राय नहीं मिलतीतब विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है।
2.     एक का गलत रवैयादूसरे को प्रभावित करता है।
3.     कुछ साझेदार बिना किसी वजह के समय-समय पर परेशानियाँ खड़ी कर देते हैं। इससे भी कंपनी के विकास कार्यों में बढ़ा उत्पन्न होती है।
4.     अलग-अलग व्यक्तियों की सोच व मानसिकता भिन्न-भिन्न होती है। ऐसे में किसी भी निर्णय व मत के प्रति उनका आकलन भी भिन्न भिन्न होता है। एक ही मुद्दे के बारे में जब भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ मिलती है तो अस्थिरता के खतरे उत्पन्न हो जाते हैं।
5.     व्यक्तियों के मन में संप्रभुता की व्यापक चाह होती है। बड़े अवसरों और निर्णय की स्थिति में यह और प्रखर हो जाती है।
संयुक्त साझा कम्पनी :-
          संयुक्त साझा कम्पनी एक बड़ा वाणिज्यिक प्रतिष्ठान होता है। भारतीय कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा तीन के अनुसार कंपनियों का पंजीकरण होता हैइसमें अंशधारी का दायित्व सीमित होता है तथा व्यापार का विस्तार पूँजी बढ़ाकर किया जाता है। कम्पनी का स्वरूप अपनी प्रकृति के अनुसार दो प्रकार का होता है :
1.     पब्लिक लिमिटेड
2.     प्राइवेट लिमिटेड
          पब्लिक लिमिटेड कम्पनी में न्यूनतम सात सदस्यों की आवश्यकता होती है। जबकि प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में दो सदस्यों से लेकर 50 सदस्य तक हो सकते हैं। साथ ही कंपनी के अंशधारकों की वर्ष में एक बार बैठक बुलाई जाती है। प्रमुख भारतीय समाचारपत्रों पर संयुक्त साझा कंपनियों का अधिकार है। उदाहरण स्वरूप इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स (प्राइवेट) लिमिटेडबेनेट कोलमैन एण्ड कम्पनी लिमिटेडआनंद बाजार पत्रिका (प्राइवेट) लिमिटेड और पायनियर लिमिटेड इत्यादि।
कम्पनी प्रणाली के लाभ -
1.      वित्त सभी कार्यों की प्राथमिक आवश्यकता होती है और कम्पनी की प्रकृति के अनुरूप इसकी वित्तीय स्थिति मजबूत होती है।
2.      व्यापक परिपेक्ष्य होने से विस्तार की समभावनाएँ होती हैं।
3.      अपरिहार्य परिस्थितियों में स्वामित्व के अनुरूप दूसरे हाथों में दिया जा सकता है।
4.      सभी व्यक्ति कम्पनी के लक्ष्यों व दायित्यों के प्रति साझा ज़िम्मेदारी लेते हैं।

कंपनी प्रणाली की कमियाँ -
1.      व्यापक फैलाव होने के कारण प्रक्रिया भी व्यापक होते होती है। अतः कंपनी के व्यावहारिक निर्माण में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
2.      अपने कार्यकारी पहलू और प्रक्रिया के कारण अल्पतंत्रीय प्रबंधन भी देखने को मिलता है।
3.      व्यापक वर्गव्यापक व्यक्ति व व्यापक प्रबंधन के तत्वों के चलते निर्णय की प्रक्रिया बाधित होती है और उसमें महत्वपूर्ण निर्णय लेने में देरी भी हो सकती है।
न्यास या ट्रस्ट :-
          ट्रस्ट ऐसे संस्थान होते हैं जिनका उद्देश्य लाभ-हानी रहित सुनिश्चित कर्तव्यों को पूरा करना होता है। यानिकिसी विशेष उद्देश्य के प्रचार-प्रसार हेतु समाचार-पत्र की संपत्ति समर्पित समाजसेवियों के प्रबंधन के अंतर्गत देने की दृष्टि से ट्रस्ट की स्थापना की जाती है। प्रकाशन से लाभ की आशा न कर सभी ट्रस्टी सेवा-भाव से पत्र के नियमित प्रकाशन पर बल देते हैं। कोलकाता का लोकसेवक और चंडीगढ़ से ट्रिब्यून ट्रस्टों द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं।
समिति या संस्थाएं :-
          सोसाइटी या एसोसिएशन के तहत ये संस्थाएं आती हैं जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड हैं और अन्य सामाजिक कार्यों के साथ-साथ समाचार-पत्र का प्रकाशन भी करते हैं। इन संस्थाओं में अध्यक्ष के साथ-साथ कार्यकरिणी के सदस्य भी होते हैंजो समूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। ये  संस्था के लक्ष्यों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए समाचार-पत्रों का प्रकाशन करते हैं जिनका उद्देश्य लाभार्जन नहीं होता है।
          इसके अलावा केंद्र व राज्य सरकारों के स्वामित्व वाले समाचार-पत्र /पत्रिकाएँ भी हैं जिनका प्रकाशन विभिन्न मंत्रालय या विभागों द्वारा किया जाता है। जैसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा रोजगार समाचारयोजनाआजकल,बालभारतीकुरुक्षेत्र आदि का प्रकाशन किया जाता है।
समाचार-पत्रों का संगठनात्मक ढांचा :-
          एक व्यापारिक प्रतिष्ठान होने के नाते किसी भी समाचार-पत्र के प्रबंध तंत्र का उद्देश्य होता है कुशल व सक्षम कार्यनिष्पादन ताकि प्रतिष्ठान एक अच्छी साख रखने के साथ-साथ अधिकतम मुनाफा भी अर्जित कर सके। कार्यों को कुशल रूप से अंजाम देने के लिए इनका विभागीय बँटवारा किया जाता है। किसी भी माध्यम आकार के समाचार-पत्र में समान्यतः पाँच विभागों द्वारा कार्य सम्पन्न किए जाते हैं।
1.      सम्पादकीय विभाग  
2.      मुद्रण व उत्पादन विभाग
3.      विपणन विभाग
4.      तकनीकी विभाग
5.      कार्मिक विभाग
          स्वामित्व के प्रकार के अनुसार अलग-अलग सांगठनिक ढांचे देखने में आते हैं। एकल स्वामित्व में तो कहीं-कहीं प्रकाशक ही स्वामीसम्पादक और प्रबन्धक होता है। लेकिन आमतौर पर मालिक ही प्रकाशक होता है और उसके अंतर्गत दो प्रमुख विभाग संपादकीय और प्रबंधन कार्य करते हैं। उन्हे हम पत्रकार और गैर-पत्रकार के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं।
प्रैस आयोग और समाचार-पत्रों की स्वामित्व प्रणाली :-
          वर्ष 1978 में गठित द्वितीय प्रैस आयोग द्वारा वर्ष 1982 में दी गई रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण सिफ़ारिश थी समाचार-प्रतरों की स्वामित्व प्रणाली और नियंत्रण को पृथक करने का मुद्दा। प्रैस आयोग के अनुसार भारतीय प्रैस विशेषकर समस्त दैनिक प्रेसों का एक महत्वपूर्ण अंश ऐसे व्यक्तियों के हाथों में हैजिनका अन्य व्यापारिक प्रतिस्थानों से संबंध है। प्रैस आयोग के अनुसार हमारे देश में सार्वजनिक मुद्दों पर जनसामान्य को शिक्षित करने में प्रैस की एक अहम भूमिका होती है। यह एक सरमानया तथ्य है कि किसी भी समाचार-पत्र की स्वामित्व प्रणाली उक्त समाचार-पत्र की नीतियोंशैली व संपादकीय और राजनीतिक झुकाव को परिलक्षित करती है। आयोग के अनुसार जनसामान्य के हित में यह नितांत आवश्यक है कि प्रैस को व्यापारिक हितों या व्यापारिक घरानों वाले स्वामित्व से अलग रखा जाए।
स्वामित्व प्रणाली और पत्रों की वैचारिक स्वतन्त्रता :-

          हमारे देश में प्रचलित स्वामित्व प्रणालियों का अनुभव यह बताता है कि एकल स्वामित्व वाले समाचार-पत्रपत्रिकाएँजिनमें कोई एक ही व्यक्ति सर्वेसर्वा होता हैवहाँ संपादकीय स्वतन्त्रता प्रभावित होती है। ऐसे पत्र की संपादकीय नीति भी वहीं होती हैजो स्वामी की। यहाँ तक कि संपादक अलग होने के बावजूद मालिक की इच्छा और नीति ही सर्वेपरि होती है। स्वामी कभी अपने व्यक्तिगत या व्यावसायिक हितों के लिए संपादकों पर दबाव डालते हैं या फिर अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए किसी दल-विशेष की ओर झुक जाते हैं। फर्मसाझेदारीसंयुक्त साझेदारी कंपनियों में भी यहीं बात लागू होती है। केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा निकाले जाने वाले पत्र-पत्रिकाओं में संबन्धित सरकार की आलोचना वाले आलेख भी नहीं छपते हैं। 

 साभार -
मीडिया की पाठशाला ब्लॉग - http://mediakipathshala.blogspot.in/2015/05/blog-post_10.html


Sunday, 7 January 2018

जनसंपर्क शोध

जनसंपर्क : एक परिचय

जनसंपर्क का अर्थ है लक्षित जनता से लक्षित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु संपर्क स्थापित करना । जनसंपर्क संचार की एक प्रक्रिया हैजिसमें जनता से संचार स्थापित किया जाता है । विभिन्न विद्वानों ने इसे निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है -
ब्रिटिश इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक रिलेशन्स के अनुसार –
जनसंपर्क जनता और संगठन के बीच सोच-समझकर,योजनाबद्ध तरीके से निरंतर किया जाने वाला प्रयास है।
जे.एल. मेकेनी (J.L. Macany) के अनुसार ‘‘प्रशासन में जन-सम्पर्कअधिकारी वर्ग तथा नागरिकों के मध्य पाये जाने वाले प्रधान एवं गौण सम्बन्धों द्वारा स्थापित प्रभावों एवं दृष्टिकोणों की पारस्परिक क्रियाओं का मिश्रण है। यह मानते हैं कि ‘‘ जनसंपर्क प्रशासन के उस कार्य का एक भाग है जिसके अन्तर्गत वह इस बात का पता लगाता है कि उसके संगठन तथा कार्यक्रम के बारे में लोग क्या सोचते हैं?’’
जॉन डी. मिलेट (John D. Millett) के अनुसार, ‘‘ जनसंपर्क इस बात की जानकारी प्राप्त करता है कि लोग क्या आशा करते है तथा इस बात का स्पष्टीकरण देता है कि प्रशासन उन मांगों को कैसे पूरा कर रहा है?’’
एच.एल. चाइल्ड्स (H.L. Childs) ने जनसंपर्क को परिभाषित करते हुए कहा है कि ‘‘विभिन्न जन-समूहों के मत को प्रभावित करने के लिए एक संगठन जो भी कार्य करता है वह सब जन सम्पर्क है।

जनसंपर्क का प्रारंभिक स्वरूप-
संत-महात्माओंराजाओं द्वारा प्रवचनस्तूपोंशिलालेखों के माध्यम से जनसंपर्क का कार्य प्राचीन समय से ही प्रारंभ हो चुका था ।
मुगल काल के ‘वाकयानवीस’ के द्वारा जनसंपर्क का कार्य काराया जाता था ।
1914-18 के दौरान सेंट्रल पब्लिसिटी बोर्ड की स्थापना ।
1921 में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इनफॉर्मेशन की स्थापना जिसे 1931 में डायरेक्ट्रेट ऑफ इन्फॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग कर दिया गया ।
1955 में IPRA (International Public Relations Association ) का गठन .
1958 पब्लिक रिलेशन्स सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना .
1958 में ही भारत में सर्वप्रथम टाटा (TATA) ने जनसंपर्क की संकल्पना को अपनाया . 
आई वी ली को आधुनिक जनसंपर्क का पिता माना जाता है .
जनसंपर्क शोध-
द्विपक्षीय प्रक्रिया के कारण जनसंपर्क विज्ञापन से महत्वपूर्ण है  । उद्भव काल से वर्तमान तक राजनीतिक संचार तथा जनमत निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहा है । सरकारी -गैर सरकारी क्षेत्रों में इसकी जरूरत तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चुनावों में बढ़ते प्रयोग की वजह से जनसंपर्क शोध अत्याधिक महत्वपूर्ण हो गया है । जनसंपर्क शोध के अंतर्गत जनता तथा संगठन के संबंधों के विविध आयामों पर शोध किया जाता है.

जनसंपर्क शोध के उदाहरण-
Øओपिनियन पोल
Øएक्जिट पोल
Øमार्केट रिपोर्ट्स
Øकॉरपोरेट सोशल रिस्पॉंसबिलिटी

जनसंपर्क शोध के प्रकार -
जनसंपर्क में शोध ( Research IN public Relations)
जनसंपर्क पर शोध ( Research ON public Relations)
जनसंपर्क के लिए शोध ( Research FOR public Relations)

जनसंपर्क शोध के उद्देश्य-
ध्यान आकर्षित करना (Brand Promotion)
विश्वास अर्जित करना (Image Building)
समझ विकसित करना (Crisis Management)
जनमत तैयार करना
बदलती मनोवृत्ति का अध्ययन

जनसंपर्क शोध के बिंदु -

आंतरिक (Internal) शोध-
Institution
Employee
Management
Production
House Journal
Trade Unions
Labour
बाह्य (External) शोध-
Target Group
Media (Print, Electronic etc..)
Consumer
Share Holders
Community
Distributor
Local Authority
Government

जनसंपर्क शोध के अंतर्गत होने वाले शोध-
मौलिक शोध
व्यावहारिक शोध
मात्रात्मक शोध
गुणात्मक शोध
मूल्यांकन शोध
जनसंपर्क शोध की सहायक सामग्री-
                Traditional media
              Print media
              Electronic media
              New media
              Libraries
              Databases
              Government Documents and websites
              Press Relies and Conferences

संदर्भ ग्रंथ सूची-
मीडिया शोधमनोज दयालहरियाणा साहित्य अकादमी
आधुनिक विज्ञापन और जनसंपर्कडी. के. रावनेहा पुस्तक केन्द्रदिल्ली
Mass media Research, Wimmer & Dominic


Saturday, 2 December 2017

वीडियो एडिटिंग के प्रकार तथा चरण Video Editing: Types & Steps (वीडियो संपादन)

वीडियो एडिटिंग के प्रकार तथा चरण Video Editing: Types & Steps (वीडियो संपादन)


वीडियो एडिटिंग अथवा वीडियो संपादन वीडियो कार्यक्रम निर्माण का एक महत्वपूर्ण भाग है । किसी भी वीडियो कार्यक्रम का निर्माण कार्य मुख्यतः तीन चरणों से होकर गुजरता है- प्री-प्रोडक्शन, प्रोडक्शन तथा पोस्ट-प्रोडक्शन । वीडियो संपादन पोस्ट-प्रोडक्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो वीडियो शूट किए जाने के बाद होता है । किसी भी फिल्म, टेलीविजन या डॉक्यूमेन्ट्री के लिए फिल्माई गई वीडियो सामग्री को आवश्यक कांट-छांट तथा अन्य विशेष प्रभावों के प्रयोग से उसे प्रसारण योग्य बनाने की कला को वीडियो संपादन या वीडियो एडिटिंग कहते हैं । वीडियो संपादन एक कलात्मक कार्य है जो वैज्ञानिक पद्धति की सहायता से किया जाता है । अर्थात् वीडियो संपादन कला और विज्ञान का रचनात्मक संगम है । आई मैक, एफसीपी मैक प्रो, एडोब प्रीमियर, एडियस इत्यादि वीडियो संपादन के लोकप्रिय सॉफ्टवेयर हैं जो वर्तमान में, एबी रोल सुविधा, डिजिटल ध्वनि संपादन और डिजिटल वीडियो संपादन सुविधाओं से युक्त हैं ।
वीडियो संपादन के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं-
§  लीनियर एडिटिंग ( Linear Editing) –
इसे रीयल टाइम एडिटिंग ( Real time Editing) तथा टेप-टू-टेप एडिटिंग (Tape-to-Tape Editing) भी कहा जाता है । 90 के दशक के पहले तक इसका प्रयोग अधिक किया जाता था । इसमें विभिन्न टेपों के कई वीडियो क्लिप एक ही टेप पर क्रमवार संपादित किए जाते थे । इस तरह की एडिटिंग में कवरेज के टेप्स को एक-एक करके कॉपी किया जाता है और फिर एक-एक करके ही उन्हें एडिट किया जाता है। इनमें ग्राफिक का अभाव था ।
§  नॉन-लीनियर एडिटिंग ( Non-Linear Editing) –
इसे डिजीटल एडिटिंग (Digital Editing), टाइम लाइन बेस्ड एडिटिंग (Timeline based Editing) तथा सॉफ्टवेयर बेस्ड एडिटिंग  (Softwere based Editing)भी कहा जाता है । इसमें विभिन्न कम्प्यूटर सॉफ्टवेयरों जैसे एफसीपी, एडोब प्रीमियर आदि की सहायता से संपादन का कार्य होता है । यह वर्तमान में सबसे प्रचलित विधि है जिसका प्रयोग विभिन्न मीडिया तथा फिल्म संस्थानों में हो रहा है । इसके अंतर्गत कट, पेस्ट जैसी बुनियादी सुविधाओं के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के ग्रफिक्स, ट्रांजीशन, एनिमेशन, साउन्ड इफेक्ट्स आदि संपादन के लिए उपलब्ध होते हैं ।
§  ऑफलाइन एडिटिंग ( Offline Editing) –
ऑफ़लाइन संपादन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कच्चे फुटेज को मूल फिल्म या वीडियो टेप को प्रभावित किए बिना मूल स्रोत से कॉपी कर संपादन कार्य किया जाता है ।
§  ऑनलाइन एडिटिंग (Online editing) –
इसका प्रयोग लाइव टेलीकास्ट करने के लिए होता है जिसमें 40 सेकेन्ड के बाद वीडियो प्रसारित होता है ।

वीडियो संपादन की प्रक्रिया (नॉन-लीनियर एडिटिंग के संदर्भ में ) -

डम्प इन        →          रफ कट          →         फाइनल कट         →          डम्प आउट

·       डम्प इन (Dump in/ Import)- इसमें रिकॉर्ड किए गए फुटेज को कम्प्यूटर सिस्टम के वीडियो एडिटिंग सॉफ्टवेयर में हार्ड डिस्क या अन्य मेमोरी डिवाइसों से इन्सर्ट किया जाता है ।
·       रफ कट (Rough cut)- इस प्रक्रिया में रिकॉर्ड किए गए फुटेज को कम्प्यूटर सिस्टम के वीडियो एडिटिंग सॉफ्टवेयर के टाइमलाइन पर कथा-पटकथा के अनुसार क्रमवार रखने का कार्य किया जाता है । इसके पश्चात् ही आगे का संपादन कार्य संभव हो पाता है । इसे सिक्वेंसिंग (Sequencing) भी कहा जाता है ।
·       फाइनल कट (Final cut)- यह वीडियो एडिटिंग का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जिसमें समस्त संपादन का कार्य होता है जैसे- एनिमेशन, ग्राफिक्स, स्पेशल इफेक्ट्स, डबिंग, मिक्सिंग, ट्रांजीशन इफेक्ट्स, फेड इन तथा फेड आउट इत्यादि ।
·       डम्प आउट (Dump Out/ Export) – यह वीडियो एडिटिंग की प्रक्रिया का अंतिम भाग है । इसमें समस्त संपादन कार्य होने के बाद अंतिम रूप से संपादित वीडियो सामग्री को प्रसारण या भविष्य में अन्य प्रयोग के लिए अपनी मेमोरी डिवाइस में संरक्षित (Save) कर लिया जाता है ।  

Sunday, 19 November 2017

शोध का अर्थ, परिभाषा, तत्व, महत्व, प्रकार, चरण और शोध डिजाइन



शोध के लिए अंग्रेजी में रिसर्च (Research) शब्द का प्रयोग किया जाता है। रिसर्च मूल रूप से लैटिन के रि अर्थात् दुबारा और सर्च अर्थात् खोजना से बना है । वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ज्ञान प्राप्त करने का निरंतर प्रयास ही शोध है ।
 अलग-अलग विद्वानों ने इसे कुछ इस तरह परिभाषित किया है-
§  रस्क के अनुसार शोध के एक दृष्टिकोण है, जांच-परख का तरीका और मानसिकता है
§  रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब  “दि रोमांस ऑफ रिसर्च” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा हैकि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं।
§  एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी ऑफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है।
§  स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिएतथ्यों के लिएनिश्चितताओं के लिए अन्चेषण है।
§  लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा हैकि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरणसाधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्धति है।
§  रूमेल  के अनुसार ज्ञान को खोजना, विकसित करना और सत्यापित करना शोध है

शोध को प्रेरित करने वाले चार प्रमुख तत्व हैं-
§  अज्ञात को जानने की जिज्ञासा
§  मौजूदा गहन समस्या के कारणों और प्रभावों को जानने की इच्छा
§  भावुकता से परे होकर असली कारणों की खोज करने की इच्छा
§  नया खोजने और पुरानी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं/विधियों को जांचने की इच्छा

शोध का महत्व-
§  शोध हमारे ज्ञान का विस्तार करता है ।
§  मानव समाज की समस्याओं के हल का रास्ता सुझाता है ।
§  शोध से तार्किक और समीक्षा की दृष्टि मिलती है ।
§  शोध के बिना ज्ञान और विकास में वृद्धि संभव नहीं ।
§  बदलती परिस्थितियों में तथ्यों की व्याख्या और पुनर्व्याख्या सिखाता है ।


शोध के प्रकार-
§   मौलिक शोध/विशुद्ध/शैक्षिक शोध- इसमें नए सिद्धांतों की स्थापनाओं पर बल दिया जाता है ।
§   व्यावहारिक शोध- किसी खास समस्या के समाधान के लिए इस शोध के निष्कर्षों का प्रयोग किया जाता है ।
§   क्रियात्मक शोध- इसके शोध निष्कर्षों का प्रयोग किसी समस्या विशेष के निवारण में प्रयोग किया जाता है ।
§   मात्रात्मक शोध- यह शोध आंकड़ों पर आधारित होता है और इसका निष्कर्ष भी आंकड़ों द्वारा ही निर्धारित होता है ।
§  गुणात्मक शोध- इस शोध में चरों का उनके गुणों के आधार पर विश्लेषण किया जाता है । गुणात्मक से तात्पर्य है गैर संख्यात्मक डेटा संग्रहण या ग्राफ़ या डेटा स्रोत की विशेषताओं पर आधारित स्पष्टीकरण ।


शोध प्रक्रिया के चरण-
§  विषय/समस्या का चुनाव ( Selection of Research Problem)
§  साहित्य समीक्षा (Review of Literature)
§  उद्देश्य (Objectives)
§  परिकल्पना/शोध प्रश्न (Hypothesis and Research Question)
§  शोध विधि और डिजाइन (Research methodology and Design)
§  यूनिवर्स का चुनाव (Selection of Universe)
§  आंकड़ों का संग्रह (Data Collection)
§  आंकड़ों का वर्गीकरण (Classification of Data)
§  विश्लेषण और व्याख्या (Analysis and Interpretation)
§  शोध निष्कर्ष (Research Findings)
§  सारांश (Summary)
§  रिपोर्ट लेखन/ शोध सार (Report writing/ Executive Summary)

§  संदंर्भ सूची (Bibliography)


शोध डिजाइन- रिसर्च डिज़ाइन (Research Design)
शोध को न्यूनतम समय, श्रम तथा ऊर्जा के साथ प्रभावी तरीके तैयार करने के लिए शोध से पूर्व जो रूपरेखा (ब्लूप्रिन्ट) तैयार करते हैं उसे ही शोध डिजाइन कहते हैं ।
शोध डिजाइन के मुख्य तीन सोपान होते हैं-
§  अवलोकन संबंधी (Observational)
§  सांख्यिकीय(Statistical)
§  क्रिया/प्रचालन संबंधी(Operational)


शोध डिजाइन के प्रकार-

प्रायोगिक (Experimental)- प्रयोगिक शोध को कारण और प्रभाव संबंध अध्ययन भा कहा जाता है । इसका लक्ष्य परिकल्पना (Hypothesis) को तथ्यों की कसौटी पर कसना है । इसमें प्रायोगिक तथा नियंत्रण (Control) समूह का प्रयोग किया जाता है ।
प्रयोगिक डिजाइन के निम्न प्रकार हैं-

3.      एक्स- पोस्ट फैक्टो
4.      पैनल स्टडी
5.      क्वासी- प्रायोगिक

अन्वेषणात्मक (Exploratory) शोध डिजाइन- पहले से मौजूद सिद्धांत का और गहराई से अध्ययन करने के लिए अन्वेषणात्मक (Exploratory) शोध डिजाइन का प्रयोग किया जाता है । इसमें शोधकर्ता विषय को समझता है, क्षेत्र खोजता है, अवधारणा विकसित करता है, शोध के उद्देश्य निर्धारित करता है, परिकल्पना को अंतिम रूप देता है और शोध की सीमाओं पर विचार करता है ।
            इसके लिए निम्न विधियों का प्रयोग किया जाता है-
§  साहित्य समीक्षा
§  सर्वेक्षण
§  केस स्टडी

वर्णनात्मक (Descriptive) शोध डिजाइन- किसी स्थिति, समूह या व्यक्ति विशेष की विशेषताएं जानने के लिए वर्णनात्मक (Descriptive) शोध डिजाइन का प्रयोग किया जाता है । इसमें आंकड़ों का संग्रह निम्न प्रकार से होता है-
§  साक्षात्कार, प्रश्नावली और अनुसूची
§  दस्तावेज

§  सर्वेक्षण


संदर्भ सूची-
मीडिया शोध, मनोज दयाल
संचार और मीडिया शोध, विनीता गुप्ता, वाणी प्रकाशन